जैन धर्म नोट्स Jain Dharm Full Notes In Hindi

जैन धर्म नोट्स Jain Dharm Full Notes In Hindi जैन शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के जिन्न शब्द से हुआ है जिसका अर्थ विजेता होता है जैन धर्म कुल 24- तीर्थकर जिसमे प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव हुए, जिन्हे जैन धर्म का संस्थापक माना जाता है, ऋषभदेव का सम्बंध अयोध्या के क्षेत्र से है 24वाँ एव अंतिम जैन तीर्थकर महावीर- स्वामी हुए जिन्हें जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है |

जैन तीर्थकरों की चर्चा ऋग्वेद में देखने को मिलती है

  1. ऋषभदेव
  2. अस्टिनमि

अस्टिनमि को भगवान कृष्ण को निकट सम्बधी बताया गया है।

दो जैन तीर्थकरों को ऐतिहासिकता प्राप्त है।

  1. पार्श्वनाथ
  2. महावीर स्वामी

24 जैन तीर्थ करों मे एक मात्र महिला जैन तीर्थकर मल्लिनाथ (19 वाँ) थी,

पार्श्वनाथ:- जैनधर्म 23 वे तीर्थकर पार्श्वनाथ हुए इनका प्रतीक चिन्हं सर्प है। ये उत्तर प्रदेश के बनारस क्षेत्र से सम्बधित है. इनके पिता काशी से इक्ष्वाकु वंशीय राजा अश्वसेन थे, इनके अनुयों को निग्रंथ कहा गया है। इन्होने अपने अनुआयों को 4 प्रकार के धर्म का पालन करने को जिसे चातुर्या धर्म कहा गया,

  • सत्य – सदा सत्य बोलना है।
  • अहिंसा – हिंसा नही कर्जा है।
  • अस्तेय – चोरी नही करना है।
  • अपरिग्रह – धन का संचय नही करना है

आर एस शर्मा लिखते है कि महावीर स्वामी के माता- पिता और स्वंय महावीर स्वामी ने भी पार्श्वनाथ की शिष्यता ग्रहण की थी,

पार्श्वनाथ के समय पुष्पचुला नामक महिला का विवरण जैन संघ के अध्यक्ष के तौर पर मिलता है।

पार्श्वनाथ को झारखण्ड के गिरीडीह मे स्थिति पार्श्वनाथ के पहाडी पर निर्माण की प्राप्ति हुई जिस कारण हम यह कह सकते हैं कि पार्श्वनाथ की पहाड़ी जैन धर्म से सम्बंधित है |

महावीर स्वामी:- महावीर स्वामी का जन्म 540 ईस्वीपूर्व में वैशाली के कुण्डग्राम मे हुआ है। उनके बचपन का नाम के वर्धमान था, उनके पिता सिद्धार्थ थे, जो की ज्ञातृक कुल प्रधान थे। अर्थात महावीर स्वामी का संबंध ज्ञातृक कुल से है। उनकी माता पिता त्रिशला थी, जो कि लिच्छवी नरेश चेटक की बहन थी, चेटक ने अपनी पुत्री का विवाह विम्बिसार के साथ करवाया था, अर्थात हम यह कह सकते है, की महावीर स्वामी का संबंध मगध राज्य परिवार से था, महावीर स्वामी की पत्नी यशोदा थी, जो कुण्डीय गोत्र ऐ संबंधित थी। उनकी पुत्री अनोज्जा प्रियदर्शना थी। जिनका विवाद जमालि के साथ हुआ। अर्थात जमालि महावीर स्वामी के दमाद हुए महावीर स्वामी का प्रथम शिष्य जमालि बजे तथा महावीर स्वामी के विरोध करना भी सबसे पहले जमालि जे ही किया था।

महावीर स्‌वामी 30 वर्ष की अवस्था हमे अपने बड़े भाई जल्दी- वर्धन से आज्ञा लेकर गृह का त्याग किये और सन्यासी जीवन जीने लगे। उसके सन्यासी जीवन पर प्रकाश’ कल्पसूत्र नामक जैन साहित्य डालता है कल्पसूत्र की रचना भद्रवाहु ने संस्कृत भाषा की की है। कल्पसूत्र यह कहता है कि महावीर स्वामी गृह त्याग के 11वे माह वस्त्र त्याग कर दिए

लगातार 12 वर्षो तक कठोर तपस्या के बाद 42 वर्ष की उर्म मे वैशाली के जामतृक नामक गाँव में त्रजुपलिका नदी के तट पर शाल वृक्ष के नीचे वर्धमान को ज्ञान की प्राप्ति हुई, पश्चात् वे महावीर अर्थात विजेता कहलाये। तट

जैन धर्म मे पूर्ण ज्ञान के लिए कैवल्य शब्द का प्रयोग किया गया है।

ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर स्वामी ने पावापुरी से जैन संघ की स्थापना की। महावीर स्वामी ने अपना पहला उपदेश राजगीर के विफुलाचल पहाड़ी मे दिया, उन्होने अपने उपदेश मे यह कहा कि संसार दु: ख झलक है। दुख का साथ और इच्छा को बताओ, इसके निवारण हेतु उन्होंने लोगो को सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने को कहा जैन धर्म में सर्वाधिक बल अहिंसा के ऊपर दिया गया है। महावीर स्वामी ने चतुर्थारि धर्म मे बल्मचर्य शब्द को जोड़ा तत्पश्चात जैन धर्म के अनुथाओ को पाँच चीजों का पालन करना अनिवार्य हो गया, जिसे जैन धर्म से पंच महावत या पंच अनुवत् कहा जाता है जो निम्न है।.

(1) सत्य (2) अहिंसा (3) अस्तेय (4) अपरिग्रह (5) ब्रहमर्थ्य

जैन धर्म में सबसे ज्यादा बल अंहिसा घर दिया गया, जिस * कारण इस धर्म से युद्ध और कृषि वर्णित था। इसलिए राजाओं और किसानों ने इस धर्म को नही अपनाया लेकिन इसके बाबाढ़ कुछ राजा जैसे – मौर्य वंश के चन्द्रगुप्त मौर्य कलिता नरेश सारखेल राष्ट्रकुट वंश के शासक अमीष वर्ष ने जैन धर्म को अपनाया। सबसे ज्यादा व्यापारी वर्ग के लोगों ने इस धर्म को अपनाया।

जैन धर्म का प्रचार प्रसाद करते हुए 72 वर्ष की अवस्था में 468 ईस्वीपूर्व पावापुरी मे महावीर वानी का देहावसान हो गया। इसके बाद जैन धर्म का अस्तित्व बनी रहे इसको लेकर हो जैन सम्मेलन आयोजित किए गए।

प्रथम जैन सम्मेलन:- यह सम्मेलज 322 ईस्वीपूर्व मे पाटलिपुत्र मे हुआ था, इस समय यहाँ के शासक चन्द्रगुप्त मौर्य थे। इस जैन सम्मेलन की अध्यक्षता स्थूलभद्र ने की। इस सम्मेलन के दौरान ही जैन धर्म दो सम्प्रदाया मे बट गया।

  1. श्वेताम्बर
  2. दिगम्बर

श्वेताम्बर सम्प्रदाय :- श्वेत वस्त्र धारण करने वाले या स्थूलभद्र के शिष्य श्वेताम्बर कहलाए। यह वाही सम्प्रदाय था, इसका मानना था कि महिलाएँ मोक्ष प्राप्त नही कर सकती है?

दिगम्बर सम्प्रदाय :- नगर रहने वाले या भढ़वाद के शिष्य (ii) दिगम्बर कहलाए। यह कट्टर वादी सम्प्रदाय था, इसका मानना था, कि महिलाएँ मोछ प्राप्त नही कर सकती है।

द्वितीय जैन सम्मेलन:– यह जैन सम्मेलन गुजरात के बल्लवी मे 513-516 ईस्वी सम्मेलन की अध्यक्षता श्रमाश्रवण ने की।

जैन दर्शन :- जैन र्शन यह कहता है कि संसार शाखत है. इसकी उत्पत्ति अजादिकाल से हुई है। और यह अनंत काल तक चलता रहेगा। इसकी असी विजास नही हो सकता है। लेकिन इसमे उत्थान और पतन का दौराज चलता रहेगा। उत्थान को उत्सर्पीनी और पतन को अपसर्पीनी कहा गया है। *

जैन धर्म मे ईश्वर की मान्यता है लेकिन जैन तीर्थकर से ईश्वर को नीचे रखा गया है।

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